पंचतंत्र की कहानियाँ

लोमड़ी ,ऊंट और सियार

पंडित विष्णु शर्मा कहानी  शुरू करते है और बताते है कि,  बहुत पुरानी  बात है भारतवर्ष के एक  वन में मतांध  नामक  सिंह राज  करता था। उस जंगल में कई जानवर रहते थे ,उन्ही जानवरों में से एक लोमड़ी , सियार और एक कौआ उसके यहाँ नौकर थे i ये तीनों बहुत ही धूर्त थे i

एक दिन उन्होंने एक  ऊंट को जंगल में देखा उन्हें यह विचित्र जानवर लगा ,  यह खबर उन तीनो ने तुरंत राजा मतांध को दि ,सिंह ने  कौवे को उसके बारे में पता लगाने को कहा i

कौआ ऊंट के पास गया और उससे बातचीत शुरू की बातचीत के दौरान उसे पता चला की वह अपने गिरोह से भटककर इस जंगल में  आ गया था। उसके बारे में सारी बात पता करने के बाद कौआ ऊंट को लेकर  सिंह के पास गया और बोला, “स्वामी! यह ऊंट नाम का जीव  है वह अपने गिरोह से भटकर इधर आ गया है और धीरे से राजा के कानों में कहा की महाराज आप इसे आसानी से अपना भोजन बना सकते है Iयह बात सुनकर  लोमड़ी और  सियार के मुँह भी पानी आ गया और वे अपनी जीभ लपलपाने लगे I

मगर  सिंह बोला, “ मैं इस तरह भटके हुए किसी असहाय  को नहीं मारता। कहा गया है कि विश्वस्त और निर्भय होकर अपने घर आए शत्रु को भी नहीं मारना चाहिए।

यह बात सुनकर  ऊंट ने सिंह को प्रणाम किया और बैठ गया। सिंह ने जब उसके वन में विचरने का कारण पूछा तो उसने अपना परिचय देते हुए बताया कि वह साथियों से बिछुड़कर भटक गया है। सिंह के कहने पर उस दिन से वह  ऊंट उनके साथ ही रहने लगा।
ऊंट राजा मतांध की दयालुता से काफी प्रभावित हुआ और मन से राजा की सेवा करने लगा, मगर यह बात लोमड़ी , सियार और कौवे को खटकने लगी i

लोमड़ी , सियार और  कौआ हमेशा इस मौके की तलाश में रहते की  ऊंट का स्वाद कैसे लिया जाये I

कुछ दिनों तक ऐसे ही चलता रहा, मगर एक दिन  राजा मतांध  शिकार करते वक्त गम्भीर रूप से चोटिल हो गया उसके कारण वह चलने-फिरने में अशक्त हो गया था। उसके अशक्त हो जाने से  वह शिकार नहीं कर पा रहा था जिसके कारण  लोमड़ी , सियार ,कौआ आदि उसके नौकर भूखे रहने लगे। क्योंकि सिंह जब शिकार करता था तो उसके नौकरों को उसमें से भोजन मिला करता था।
अब सिंह शिकार करने में असमर्थ था। अपने नौकरों की दुर्दशा देखकर सिंह बोला, “किसी ऐसे जीव की खोज करो कि जिसको मैं इस अवस्था में भी मारकर तुम लोगों के भोजन की व्यवस्था कर सकूं।” सिंह की आज्ञा पाकर लोमड़ी , सियार और कौआ हर तरफ शिकार की तलाश में घूमने निकले। जब कहीं कुछ नहीं मिला तो लोमड़ी , सियार और कौवे ने आपस में  सलाह की। धूर्त लोमड़ी बोली , “मित्रों   इधर-उधर भटकने से क्या लाभ? क्यों न  ऊंट  को मारकर उसका ही भोजन किया जाए?” यह सुनकर सियार और कौवे की आँखों में चमक आ गयी, तभी कौवा बोला मगर यह होगा कैसे ? तब लोमड़ी ने अपनी योजना उन दोनों को बताई I
योजना अनुसार लोमड़ी  सिंह के पास गई और बोली , “स्वामी! हम सबने मिलकर सारा वन छान मारा है, किन्तु कहीं कोई ऐसा पशु नहीं मिला कि जिसको हम आपके समीप मारने के लिए ला पाते। अब भूख इतनी सता रही है कि हमारे लिए एक भी कदम  चलना कठिन हो गया है।

तभी योजना  अनुसार  सियार  अपने साथियों को बुला लाया। उसके साथ ऊंट भी आया। उन्हें देखकर सिंह ने पूछा, “तुम लोगों को कुछ मिला?”
कौवा, सियार,  सहित दूसरे जानवरों ने बता दिया कि उन्हें कुछ नहीं मिला।

तभी लोमड़ी  के इशारे पर धूर्त सियार आगे आया और  सिंह से  विनती करने लगा की  वह उसे  मारकर खा लें। तभी लोमड़ी तपाक  से बोली अरे तुम्हे मारने से क्या होगा तुम इतने छोटे हो की तुमसे तो किसी का भी पेट नहीं भरेगा I तभी लोमड़ी ने आँखों ही आँखों में इशारा किया और कौवा सिंह के सामने गिडगिडाते हुए बोला महाराज आप  मेरा शिकार कर लीजिये तभी लोमड़ी बोली  अरे तुम तो सियार से भी छोटे हो तुम्हे मारने से क्या होगा ? इसी प्रकार कई छोटे बड़े जानवरों ने आगे आकर रजा से विनती की मगर योजन अनुसार लोमड़ी हर बार  कुछ न कुछ खामी बता देती  ताकि सिंह उन्हें न मार सके।
अंत में ऊंट की बारी आई। बेचारे सीधे-साधे  ऊंट ने जब यह देखा कि सभी सेवक अपनी जान देने की विनती कर रहे हैं तो वह भी पीछे नहीं रहा।
उसने सिंह को प्रणाम करके कहा, “स्वामी! ये सभी आपके लिए अभक्ष्य हैं। किसी का आकार छोटा है, किसी के तेज नाखून हैं, किसी की देह पर घने बाल हैं। आज तो आप मेरे ही शरीर से अपनी जीविका चलाइए जिससे कि मुझे दोनों लोकों की प्राप्ति हो सके।”
ऊंट का इतना कहना था कि लोमड़ी ने तुरंत कहा की महाराज ऊंट सही कह रहा है और उसका आकर भी बड़ा है , बस इतना कहते ही लोमड़ी सियार आदि ऊंट पर  झपट पड़े और देखते-ही-देखते उसके पेट को चीरकर रख दिया। बस फिर क्या था, भूख से पीड़ित सिंह और सियार  आदि ने तुरन्त ही उसको चट कर डाला।

सीख : धूर्तों के साथ जब भी रहें पूरी तरह से चौकन्ना रहें, और उनकी मीठी बातों में बिलकुल न आयें I