“पंचतंत्र की कहानियाँ ”

व्यापारी और सेवक

साथियों सफल व्यक्ति और महान व्यक्ति में अंतर होता  है आज प्रस्तुत है  पंचतंत्र से ली गयी एक  ऐसी ही कहानी जो आपको सफलता से  महानता की और ले जाएगी

पंडित विष्णु शर्मा कहानी  शुरू करते है और बताते है कि,  बहुत पुरानी  बात है भारतवर्ष के एक नगर में  एक  व्यापारी   रहता था। उस व्यापारी की कुशलता के चर्चे बड़ी दूर –दूर तक फैले हुए थे I जब वहा के राजा को  उसकी कुशलता के बारे में पता चला  तो राजा ने उसे बुलवाया i राजा ने उसके बारे में जैसा सुना था  उससे कही बढकर उसे पाया i उसकी कुशलता और क्षमता को  देखकर  राजा ने उसे राज्य का मंत्री  बना दिया। अपने कुशल तरीकों से व्यापारी  ने राजा और  प्रजा  को बहुत खुश रखा।

उस व्यापारी की  एक सुशिल कन्या थी जो अब बड़ी हो गयी थी और वो दिन भी आ गया  जब  व्यापारी  ने अपनी लड़की का विवाह तय किया। इस  अवसर पर  उसने एक बहुत बड़े भोज का आयोजन किया। इस भोज में उसने राज परिवार से लेकर प्रजा तक सभी को आमंत्रित किया। उस भोज में राजघराने का एक सेवक, जो महल में साफ सफाई का काम करता था, वह भी इस भोज में शामिल हुआ ।

उस दोरान एक घटना घटी और घटना यह थी कि गलती से वह सेवक एक ऐसी कुर्सी पर बैठ गया जो केवल राज परिवार के लिए रखी हुयी थी। सेवक को उस कुर्सी पर बैठा देखकर व्यापारी बहुत गुस्सा हौ जाता है  और वह सेवक को दुत्कार कर वहाँ से भगा देता है। सेवक को बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती है और वह व्यापारी को सबक सिखाने की  ठान  लेता है ।
सेवक सोचता रहा की किस तरह व्यापारी  को सबक सिखाया जाये तब उसको एक तरकीब सूझती  है और वह खुश हो जाता है I अगले ही दिन सेवक राजा के कक्ष में सफाई कर  रहा था । वह राजा को आता  देख कर बड़बड़ाना शुरू कर देता है और बोलता है, “इस व्यापारी  की इतनी मजाल की वह रानी के साथ दुर्व्यवहार करे। ” यह सुन कर राजा  सेवक से पूछता है, “क्या यह वाकई में सच है? क्या तुमने व्यापारी को दुर्व्यवहार करते देखा है?” सेवक तुरंत राजा के चरण पकड़ता है और बोलता है, “मुझे माफ़ कर दीजिये, मैं कल रात को सो नहीं पाया। मेरी नींद पूरी नहीं होने के कारण कुछ भी बड़बड़ा रहा था।” यह सुनकर राजा सेवक को कुछ नहीं बोलता लेकिन उसके मन में शक पैदा हो जाता है।
उसी दिन से राजा व्यापारी के महल में निरंकुश घूमने पर पाबंदी लगा देता है और उसके अधिकार कम कर देता है। अगले दिन जब व्यापारी  महल में आता है तो उसे संतरि रोक देते हैं। यह देख कर व्यापारी बहुत आश्चर्य -चकित होता है। तभी वहीँ पर खड़ा हुआ सेवक ताना मारते   हुए बोलता है, “अरे संतरियों, जानते नहीं ये कौन हैं? ये बहुत प्रभावशाली व्यक्ति हैं जो तुम्हें बाहर भी फिंकवा सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसा इन्होने मेरे साथ अपने भोज में किया था। तनिक सावधान रहना।”
यह सुनते ही व्यापारी को सारा माजरा समझ में आ गया । वह सेवक से माफ़ी मांगता है और सेवक को अपने घर खाने पर बुलाता है। व्यापारी  सेवक की खूब आव-भगत करता है। फिर वह बड़ी विनम्रता से भोज वाले दिन किये गए अपमान के लिए क्षमा मांगता है और बोलता है की उसने जो भी किया, गलत किया। सेवक बहुत खुश होता है और व्यापारी से बोलता है, “आप चिंता ना करें, मैं राजा से आपका खोया हुआ सम्मान आपको ज़रूर वापस दिलाउंगा ।”
अगले दिन राजा के कक्ष में झाड़ू लगाते हुआ सेवक फिर से बड़बड़ाने लगता है, “हे भगवान, हमारा राजा तो इतना मूर्ख है कि किसी भी बात पर विश्वाश कर लेता है ।” यह सुनकर राजा क्रोधित हो जाता है और बोलता है, “मूर्ख, तुम्हारी ये हिम्मत? तुम अगर मेरे कक्ष के सेवक ना होते, तो तुम्हारा सर कलम करवा देता ।” सेवक फिर राजा के चरणों में गिर जाता है और दुबारा कभी ना बड़बड़ाने की कसम खाता है।
राजा भी सोचता है कि जब यह मेरे बारे में इतनी गलत बातें बोल सकता है तो इसने व्यापारी  के बारे में भी गलत बोला होगा। राजा सोचता है की उसने बेकार में व्यापारी  को दंड दिया। अगले ही दिन राजा व्यापारी पर लगायी गयी साडी पबंदिया हटा लेता है और व्यापारी  को महल में उसकी खोयी प्रतिष्ठा वापस दिला देता है।

साथियों इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है की अगर हमें सफलता के साथ अगर महान बनना है तो हमें यह भी ध्यान रखना होगा की हमारे  द्वारा किसी व्यक्ति का अनादर न हो I

इसीलिए कहते की सफल होना अलग बात है और महान बनना अलग बात I