गणित
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बचपन से गणित कमज़ोर है
अधिक लौटा देता हूँ
कम-कम लेकर
घाटे में रहता हूँ संसार के व्यापार में

फिर भी रोज़-रोज़ के धोखे और छल से
कुछ सीखता रहता हूँ
सूर्य से जुगनुओं को घटा देता हूँ
तो चन्द्रमा हासिल आता है

अर्थशास्त्री कहते हैं; मनुष्यता को
घटा दो पूँजी से
मगर मैं पूँजी से मनुष्यता को
जोड़ देता हूँ
तो पूँजी हाथ से चली जाती है
घाटे में रहता हूँ

ओ मेरी सभ्यता के आकाओं
जीवन को कितना गणित और भौतिक
बना दिया तुमने
जबकि यह; प्रत्येक बार एक कला है
अश्रुपूरित नयन में स्वप्न का इंद्रधनुष।

◽ एकान्त श्रीवास्तव