क्यों मनाया जाता है  होली पर्व?  

साथियों सबसे पहले रंगों के त्यौहार होली की आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ I

दोस्तों हम हर साल फागुन माह की पूर्णिमा के दिन होली का त्यौहार मनाते है, मगर  क्या आप जानते है ? की होली का त्यौहार क्यों मनाया जाता है ? तो आईये आपको बताते है होली के त्यौहार के बारे में:

हिरण्यकश्यप नाम का एक राजा  था वह राजा  असुरी स्वाभाव का था और स्वयं को भगवान से भी श्रेष्ठ मानता था i उसके राज्य में कोई भगवान का नाम नहीं ले सकता था I एक बार उसकी पत्नी कयाधु (प्रह्लाद की जननी ) ने अपने पति हिरण्यकश्यप से होशियारी से ‘नारायण-नारायण’ नाम की एक माला जपवा ली I कहते है इसके प्रभाव से ही कयाधु , प्रह्लाद जैसे विष्णुभक्त की माँ बनी I कयाधु के अलावा सभी परिजन हिरण्यकश्यप और बुआ होलिका आदि असुरी स्वभाव के थे I शुक्राचार्य गुरु तो थे , पर अपनी प्रकृति के कारण असुरी स्वभाव के कहे जाते थे I  प्रह्लाद भी विष्णुभक्त ही निकले I

हिरण्यकश्यप को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं थी की उसका पुत्र भगवान विष्णु की भक्ति  करे और उसने अपने बेटे प्रह्लाद को भगवान विष्णु की भक्ति से दूर करने के लिए बहुत  प्रयास  किये और यातनाएँ  दीं I लेकिन भगवान विष्णु ने हर बार प्रह्लाद के  प्राणों की रक्षा की … I

                     

जिन कारणों से फागुन महशूर है, उनमे दीवानापन और मस्ती  भी शामिल है I ऐसा नहीं है की फागुन कोई पहली  बार आया हो और लोगों में आनंद – उल्लास जगा हो, लेकिन कहते है शुरुआत प्रह्लाद से हुई I प्रह्लाद अर्थात खास किस्म के उल्लास से सराबोर व्यक्तित्व I आनंद और उल्लास पहले भी रहे होंगे, लेकिन अर्जित या विकसित स्तिथि में पहली बार प्रह्लाद के रूप में स्थापित हुआ I

हिरण्यकश्यप ने बहुत कहा – सुना और यातनाएं दी, पर बेटे प्रह्लाद  को  विष्णुभक्ति से डिगा न सका I

प्रह्लाद के बारे में कहते है की उन्होंने मां के गर्भ से ही भक्ति के संस्कार ग्रहण कर लिए थे I नारद जैसे परम भागवत का सान्निध्य मिलने पर देत्य्कुल में जन्म लेने पर भी प्रह्लाद बचपन से ही भक्त हो गए I प्रह्लाद को भक्त बनता देख हिरण्यकश्यप ने पुत्र, को दैत्य्गुरु शुक्राचार्य के आश्रम में भी भेजा I वहां उसने लौकिक विद्याएं सीखी तो सही लेकिन भक्ति के संस्कार ही पल्लवित हुए I  नारद के अलावा दत्तात्रेय, शंड और मर्क आदि ऋषियों ने भी प्रह्लाद को शिक्षित और संस्कारित किया I

प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप खुद को ही इश्वर मानता था I वह अपनी पूजा कराने लगा था I ऐसी शक्तियां और सिद्धियां उसने पा ली थी कि कोई भी प्राणी, कही भी, किसी भी समय उसे मार नहीं सकता था I किसी भी जिव – जंतु, देवी – देवता, राक्षस या मनुष्य से नहीं मारा जा सकता था, न रात में न दिन में, न पृथ्वी पर, न आकाश में, न घर में, न बाहर, न अस्त्र द्वारा न शस्त्र द्वारा मारा जा सकता था I

ऐसा वरदान पाकर वह निरंकुश और अत्याचारी हो गया I उसका पुत्र प्रह्लाद की विष्णुभक्ति उससे खलने लगी I उसने प्रह्लाद को मारने के कही प्रयत्न किये. मगर वो हर बार बच जाता I  हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को आग से बचने का वरदान प्राप्त था I हिरण्यकश्यप ने होलिका की मदद से प्रह्लाद को जलाकर मरने की योजना बनाई I योजना अनुसार होलिका प्रह्लाद को गोदी में लेकर जलती हुई आग में जाकर बैठ गई I भगवान की कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जल कर राख़  हो गई I

हिरण्यकश्यप का संहार करने के लिए भगवन विष्णु ने नरसिंह का अवतार लेके खम्बे से अवतरित होकर गोधूलि के समय    हिरण्यकश्यप का वध किया तभी से ‘होली’ का त्योहार मनाया जाता है I हिरण्यकश्यप के  वध के बाद उत्तराधिकारी के रूप में प्रह्लाद अभिषिक्त हुए I नरसिंह ने उन्हें पाताल का राज्य दिया I

            

तो दोस्तों ये थी होली पर्व की कहानी आशा करता हूँ पसंद आई होगी I