जो मैं कहना चाहता हूँ !

साथियों हम सभी कुछ न कुछ कहना चाहते हैं मगर कई बार चाह कर भी कुछ नहीं कह पते हैं , कुछ लफ्ज़अधूरे रह जाते हैं कुछ सपने अधूरे रह जाते हैं , जिंदगी की इसी कश्मकश में एक कविता जन्म लेती हैं आज वही कविता प्रस्तुत हैं जो मेरे मन के विचारों से जन्मी हैं  इस कविता को जरा ध्यान से पढ़ियेगा शायद इसको पढ़ने के बाद आपके सपनो को नयी उड़ान मिलें , कविता का शीर्षक हैं

“जो मैं कहना चाहता हूँ”

जो मैं कहना चाहता हूँ ,

क्या मेरी कविता कह पायेगी ?

जब हम जिंदगी को समझेंगे,

मौत सामने खड़ी नजर आएगी I

क्या होगा उन इरादों का,

स्वयं से किये गए वादों का,

क्या अपनी ही कसमों को तोड़ देंगे,

या सफलता की कहानी को अधूरा छोड़ देंगे ?

रह जायेंगे ख्वाब अधूरे,

कैसे करेंगे उनको पुरे,

क्या मौत हमारे कहने से,

एक पल भी रुक पायेगी  ?

जो मैं कहना चाहता हूँ ,

क्या मेरी कविता कह पायेगी ?

जब हम जिंदगी को समझेंगे,

मौत सामने खड़ी नजर आएगी I

न मंजिल पता है, न रास्ता पता है,

सोचो जरा इसमें किसकी खता है,

खुद को बदलना ही होगा,

हाँ हमे चलना ही होगा

मंजिल नहीं चल कर,

हमारे पास आएगी I

जो मैं कहना चाहता हूँ ,

क्या मेरी कविता कह पायेगी ?

जब हम जिंदगी को समझेंगे,

मौत सामने खड़ी नजर आएगी I

यहाँ कौन किसका सहारा है,

उड़ो की ये आकाश तुम्हारा है,

ये नदिया, चमन, बहारें,

ये पर्वत ये दिलकश नज़ारे,

ये सूरज, चाँद, सितारें,

और यह प्रकाश तुम्हारा है,

रखो भरोषा खुद पर सच कहता हूँ,

किस्मत बदल जाएगी I

जो मैं कहना चाहता हूँ ,

क्या मेरी कविता कह पायेगी ?

जब हम जिंदगी को समझेंगे,

मौत सामने खड़ी नजर आएगी I

जो करना है आज करे हम,

जला कर चिराग दूर करे तम,

पल पल बदलते है यहाँ मौंसम,

इस पतझड़ में फिर से बहार आएगी

जो मैं कहना चाहता हूँ ,

क्या मेरी कविता कह पायेगी ?

जब हम जिंदगी को समझेंगे,

मौत सामने खड़ी नजर आएगी I

 

(A poem by Pawan Mandloi)