मुझे हार स्वीकार नहीं,

मैं थका हूँ, हारा नहीं !

गिरा वही, जो शिखरों पर चढ़ा नहीं,

हारा वही, जो मुश्किलों से लड़ा नहीं !

दोस्तों नमस्कार !

मै जब पांचवी क्लास मै पढ़ता था तब मैंने एक कहानी पढ़ी थी, जिसका शीर्षक (Title) था “अब्बू खां की बकरी” मुझे इस कहानी के लेखक का नाम तो नहीं पता, पर इस कहानी के शब्द और सिख मुझे अभी भी याद है जो मुझे अभी भी प्रेरणा देती है:

इस कहानी के अनुसार अल्मोड़ा जिले के एक गांव मै एक अब्बू खां रहते थे उनके पास बहुत सारी बकरियाँ थी, उनमे से एक बहुत ही सुन्दर बकरी थी जिसका नाम चांदनी था ! अब्बू खां चांदनी से बहुत प्यार करते थे और उसे कभी जंगल और पहाड़ों पर अकेला नहीं छोड़ते थे , क्योंकि उन पहाड़ो मै एक खूंखार भेड़िया रहता था, जो बकरियों को मार कर खा जाता था !

मगर चांदनी का मन पहाड़ों की सुंदरता और हरी-हरी घांस देखकर ललचाता था और ओ भी बाकि बकरियों की तरह पहाड़ो पर जाना चाहती थी !  एक दिन चांदनी को मौका मिल गया और वह भी बाकि बकरियों के साथ  पहाड़ों में चली गयी और  हरी- हरी घांस का मजा लेते हुए इधर उधर दौड़ने लगी इस तरह दिन बीतता गया मगर शाम होते – होते , उस खूंखार भेड़िये की आहट हुयी तो बाकि सब बकरिया सहम गयी और भागने लगी परन्तु ,चांदनी न तो डरी और न ही भागी , उसने उस भेड़िये का सामना करने की  मन में ठान ली और हुआ भी वही भेड़िया चांदनी के सामने आ पहुंचा और चांदनी के सामने गुर्राने लगा, मगर चांदनी ने भी फैसला कर लिया था की ओ पीछे  नहीं हटेगी ! आखिरकार चांदनी और भेड़िये के बिच लड़ाई शुरू हो गयी चांदनी ने भेड़िये को जबरदस्त टक्कर  दि, एक बार तो ऐसा लगने लगा जैसे चांदनी जीत जाएगी परन्तु अंत में भेड़िये ने चांदनी को हरा दिया, और चांदनी ने लड़ते – लड़ते दम तोड़ दिया मगर वह अंतिम सांस तक भेड़िये से लड़ती रही और मरते दम तक भेड़िये से हार नहीं मानी !

यह सब एक पेड़ पर बैठी कुछ चिड़िया देख रही थी और लड़ाई ख़त्म होने के बाद चिड़िया बोलने लगी भेड़िया जीत गया – भेड़िया जीत गया,मगर उनमे से एक बूढ़ी चिड़िया बोली जीत तो चांदनी की हुई है ! क्योंकि वह लड़ी और बिना लड़े उसने हार नहीं मानी !

तो दोस्तों यह कहानी हमें यह सिख देती है की हमें जीवन में आने वाली चुनोतियो का सामना करना चाहिए और बिना लड़े  ही उनसे हार नहीं माननी चाहिए !